???? ‘रिमझिम बरसे बदरिया’ कार्यक्रम में पद्मश्री मालनी अवस्थी ने मीरजापुर से बनारस तक की कजरी की परंपरा को सुरों में पिरोया, श्रोताओं की आंखें नम और दिल भावुक



खबरी न्यूज चकिया‚ चंदौली ।
उतरते सावन के सुरों में सजी जब पद्मश्री मालनी अवस्थी की आवाज़, तब राजदरी घाटियों में सिर्फ़ “कजरी” नहीं, बल्कि आत्मा की संवेदनाएं गूंजने लगीं। चकिया-नौगढ़ के बीच बसे चन्द्रप्रभा रिसोर्ट में शनिवार की संध्या एक यादगार भोजपुरिया संगीत संध्या में बदल गई। चार दिवसीय ‘रिमझिम बरसे बदरिया’ कजरी कार्यशाला के समापन अवसर पर देशभर से आए प्रशिक्षणार्थियों और श्रोताओं ने सुरों की एक ऐसी बारिश देखी, जिसने रूह तक भिगो डाली।
???? दिग्विजय सिंह की परिकल्पना और सोनचिरैया की प्रस्तुति
कार्यक्रम के मुख्य आयोजक दिग्विजय सिंह के अथक प्रयास से भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय और नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (NCL) के सहयोग से यह कार्यक्रम आयोजित हुआ। भोजपुरिया लोककला को विश्वपटल पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में यह आयोजन एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ।
???? गुरु संग शिष्य मंच पर – सुरों की महा-गंगा
कार्यक्रम की सबसे खास बात रही, जब मालनी अवस्थी के साथ विभिन्न प्रांतों से आईं प्रशिक्षणार्थियों ने मंच साझा किया। मंच पर कहरवा, दादरा, ठुमरी, बनारसी कजरी, मिर्जापुरिया कजरी, गोरखपुरी कजरी, और अवधी लोकधुनों की ऐसी फुहार पड़ी कि हर कोई मंत्रमुग्ध हो उठा।
❝ “हमार सावन के सिंगार बानी तू… हो रामा… तोहार बिना सून लागे अंगना…” ❞
यह कजरी जब मालनी अवस्थी ने अलाप के साथ छेड़ी तो उपस्थित जनसमूह की आंखें नम हो उठीं।
???? भावनाओं से ओतप्रोत दृश्य –राजदरी घाटियों में सुर और संस्कृति का संगम
रेशमी साड़ियों में सजी महिलाओं, कुर्ता-पायजामा में बैठे लोकगायन के प्रेमियों और कैमरों की चमक के बीच मंच पर जब मालनी अवस्थी ने “घनन-घनन गरजे बदरिया…” शुरू किया, तो बादल भी शरमा गए।
चारों ओर कजरी का जादू, संस्कृति का श्रृंगार, और भोजपुरिया अस्मिता का अद्भुत प्रदर्शन – यह दृश्य देखने के लिए केवल जिले भर से नहीं, बल्कि वाराणसी, मिर्जापुर, गाजीपुर, सिंगरौली, लखनऊ और दिल्ली तक से लोग उमड़े।
???? अवनीश अवस्थी समेत जिले के अधिकारी भी रहे मौजूद
इस खास अवसर पर पूर्व मुख्य सचिव व लोकसंस्कृति के प्रबल समर्थक अवनीश अवस्थी भी मंचासीन रहे। उनके साथ जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, एसडीएम चकिया, सीडीओ, संस्कृति विभाग के अधिकारी और प्रशासनिक अमले ने भी सुरों का रसास्वादन किया।
✨ अवनीश अवस्थी ने कहा:
“लोककलाएं किसी भी सभ्यता की आत्मा होती हैं। मालनी अवस्थी जैसी विभूतियां उन्हें जीवित रखने का कार्य कर रही हैं।“

???? राजदरी रिसोर्ट बना कजरी तीर्थ
चारों तरफ हरियाली, चन्द्रप्रभा झील के समीप बहती ठंडी हवाएं, और बीच में सुरों की गूंज – रिसोर्ट मानो लोकसंगीत तीर्थ बन गया था। इस आयोजन से चकिया और नौगढ़ के आदिवासी अंचलों में सांस्कृतिक चेतना का जो संचार हुआ, वह आने वाले वर्षों तक स्मरणीय रहेगा।
???? लोकगीतों में संजीवनी – नई पीढ़ी से जोड़ा गया भोजपुरिया विरासत से
कार्यशाला के माध्यम से सिखाई गई गायन की बारीकियां, ताल-लय की तकनीक, गीतों की व्याख्या और भाव प्रस्तुति ने युवा प्रतिभाओं को लोकमंच के लिए तैयार किया। इसमें भाग लेने वालों में छात्राएं, लोकगायिका बनना चाहने वाली गृहिणियां, और सांस्कृतिक शोधकर्ता तक शामिल थे।
???? सोनचिरैया संस्था की प्रेरणा से नया कजरी आंदोलन
इस कार्यक्रम के ज़रिए ‘सोनचिरैया’ संस्था ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि संकल्प और समर्पण हो, तो भोजपुरिया कला को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय पहचान दी जा सकती है। संस्था की संचालिका ने बताया कि आने वाले महीनों में ‘लोकगीत संगोष्ठी’, ‘लोकनृत्य प्रशिक्षण शिविर’, और ‘बिरहा महोत्सव’ की भी योजना है।
???? कुछ खास क्षण – कैमरे में कैद हुईं सजीव भावनाएं
- मंच पर सजीव नृत्य के साथ प्रस्तुत “बरसन लागल सावनवा…”
- मालनी अवस्थी का श्रोताओं से सीधा संवाद: “कजरी सिर्फ गीत नहीं, यह हमारी मां की लोरी है।”
- मंच से लेकर श्रोताओं तक लोगों की आंखों में लोकभाव, अपनापन और आभार।
???? समापन नहीं, आरंभ है यह सुर यात्रा का
कार्यक्रम का समापन मालनी अवस्थी के द्वारा गाए इस गीत से हुआ:
“काहे को ब्याही बिदेस, रे लाली…”
जैसे ही यह गीत खत्म हुआ, पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था, यह भोजपुरी अस्मिता की पुनर्स्थापना थी। और चंदौली की धरती इसका साक्षी बनी।
????️ खबरी न्यूज विशेष टिप्पणी:
???? जब लोकगीत मंच से निकलकर जनमानस की आत्मा में उतरते हैं, तब मालनी अवस्थी जैसे कलाकार उन्हें केवल गाते नहीं, जीते हैं। चकिया की धरती पर यह आयोजन आने वाले समय में जिले को सांस्कृतिक राजधानी के रूप में स्थापित करने की ओर पहला कदम है।
राजदरी रिसोर्ट में मालनी अवस्थी के कजरी कार्यक्रम पर आधारित पूरा भोजपुरिया समाचार:
शुध्द भोजपुरिया अंदाज में- राजदरी रिसोर्ट में गूंजल कजरी के सुर, मालनी अवस्थी के गवईं ठाठ देख के हक्का-बक्का रह गइल भीड़!”
चकिया अउर नौगढ़ के बिचे बइठल राजदरी रिसोर्ट में जब पद्मश्री मालनी अवस्थी कजरी गइली, त साँच कहीं त भोजपुरिया अस्मिता गूंजन लागल। सावन के बदरिया त बरसत रहल आसमान में, बाकिर असली ‘रिमझिम’ त इहाँ के सुरवा में बरसल।
चार दिने तक चलल “रिमझिम बरसे बदरिया” कजरी कार्यशाला के समापन कार्यक्रम में मंचवा से लेके मैदान ले, हर जगहा सुर, ताल अउर संस्कार के समंदर लहरात रहल।
???? “का गइली मालनी जी! जइसे माई गावत होई लोरी!”
कार्यक्रम के सुरु होखते मंच पर जब मालनी अवस्थी “काहे को ब्याही बिदेस…” के मीठ सुर छेड़ली, त पंडाल में बइठल बूढ़-बुजुर्गन के आंख लोराय गइल। ओइसहीं लागल जइसे माई के अंचरा से झांकत भोजपुरी गायकी आज फेरू जियत होखे।
???? दिग्विजय सिंह के मेहनत से सजल मंच
ए कार्यक्रम के पीछे दिग्विजय सिंह के परिश्रम अउर सोच बा। ई कार्यक्रम भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय, नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड अउर सोनचिरैया संस्था के सहयोग से सजावल गइल रहल।
???????? मालनी जी के शिष्यन के संग मंच गूंजल!
देश के अलग-अलग कोना से अइले प्रशिक्षणार्थी लोग, जे मालनी अवस्थी के सिखल गीतन के मंच पर खुद उनकर संग सुर में सुर मिलवलें।
कहरवा, दादरा, ठुमरी, मीरजापुरी कजरी, बनारसी कजरी – अइसन बाड़ी सुरन के बरखा भईल कि लोग कहे लागल – “ई त सुर के सावन ह!”
???? अवनीश अवस्थी समेत आला अफसर लोगन के मौजूदगी
मंच पर मालनी जी के साथे पूर्व मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी, जिलाधिकारी, पुलिस कप्तान, एसडीएम, सीडीओ आउर कई विभागन के अधिकारी भी उपस्थिति में रहलें।
❝ लोकसंस्कृति जिन्दा रही, त समाज के आत्मा जिन्दा रही। मालनी जी जइसन लोग इ संस्कृति के माई के गोदी में सहेज के राखले बाड़ी। ❞ — अवनीश अवस्थी
???? राजदरी के घाटी बना सुर के तीर्थ
जइसे घाट पर गंगा के आरती होला, ओइसहीं एह कार्यक्रम में कजरी गीतन के गूंज से पूरा रिसोर्ट सुर तीर्थ बन गइल। बड़का-बड़का मंच त बहुत होले, बाकिर ए कार्यक्रम के भोलापन, अपनापन अउर लोक-संवेदना के कोई जोड़ नइखे।
???? भोजपुरी संस्कृति के नवका शुरुआत
“सोनचिरैया” संस्था के एह प्रयास से अब लोकगीत, लोकनृत्य अउर लोकगाथा पर लगातार आयोजन के तैयारी बा। भोजपुरिया प्रतिभा के मंच देबे के ई पहल पूरा पूर्वांचल के सांस्कृतिक आंदोलन बना सकत बा।
???? समापन ना, ई त सुर यात्रा के आगाज़ बा
कार्यक्रम के आखिरी गीत “बरसन लागल सावनवा…” के संग लोग खड़ा होके तालियां से स्वागत कइलस।
इ कार्यक्रम इ बता गइल कि कजरी खाली गीत ना ह, ई त जन-जन के आत्मा ह।
मालनी अवस्थी ओकरे जननी जइसन बाड़ी।
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