( खबरी न्यूज एडिटर-इन-चीफ़ K.C. Shrivastava (Adv.) की कलम से, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. परशुराम सिंह और अध्यक्ष डॉ. प्रद्युम्न कुमार सिन्हा की जुबानी)



???? प्रस्तावना
बिहार की पावन धरती जहानाबाद, जहाँ मिट्टी में बलिदान की सुगंध और गंगा-जमुनिया संस्कृति की मिठास है, वहीं 10 फरवरी 1894 को जन्म हुआ एक ऐसे सपूत का, जिसने न केवल अंग्रेज़ी हुकूमत की जड़ें हिला दीं बल्कि स्वतंत्र भारत को नया मार्ग भी दिखाया।
वह सपूत थे — दादा श्री बाबू रामविलास सिंह।
उन्हें जनता “जननायक”, “राष्ट्र रत्न” और “सृजन पुरुष” के नाम से जानती है।
एडिटर-इन-चीफ़ K.C. Shrivastava लिखते हैं:
“आज की पीढ़ी को असली देशभक्ति सीखनी है तो दादा श्री के जीवन से सीखे। वह केवल आज़ादी के योद्धा नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के निर्माता भी थे।”
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. परशुराम सिंह कहते हैं:
“उनमें गांधीजी की आत्मा, शिवाजी का साहस और सहजानंद सरस्वती का किसान प्रेम समाया था।”



✨ अध्याय 1: बाल्यकाल और पारिवारिक संस्कार
रामविलास जी का जन्म एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ। पिता न्यायप्रिय, माता करुणामयी और दादा धार्मिक प्रवृत्ति के।
???? दादा उन्हें रामायण और महाभारत की कथाएँ सुनाते। बचपन से ही त्याग और न्याय उनके जीवन में उतर गया।
गाँव की पाठशाला में पढ़ते हुए वे साथियों को पढ़ाते और गरीब बच्चों को मदद करते।
खेत की मेड़ों पर दौड़ते हुए वे कहते —
“जिस दिन भारत स्वतंत्र होगा, यही धरती सोना उगलेगी।”
✊ अध्याय 2: आज़ादी की लौ का बीज
1919 का जलियांवाला बाग़ कांड उनकी आत्मा में आग बन गया।
उन्होंने खादी धारण की, विदेशी वस्त्र बहिष्कृत किए और गांधीजी के सत्याग्रह से प्रेरित होकर आंदोलन की राह पकड़ ली।
उनका नारा गूंजा —
“आज़ादी भीख नहीं, हमारा अधिकार है।”
गाँव-गाँव जाकर उन्होंने जनता को जगाया। किसानों से कहते —
“खेत की मेड़ बचाओ, और देश की सीमा भी। अगर आत्मा में स्वाभिमान है तो कोई ताकत तुम्हें झुका नहीं सकती।”
???? अध्याय 3: स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका
1930 का नमक सत्याग्रह हो, 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन या किसानों के विद्रोह — हर जगह रामविलास सिंह सबसे आगे रहे।
???? अंग्रेज़ अफसरों के सामने निडर होकर बोले:
“यह भारत माता की संतान है, गुलामी स्वीकार नहीं करेगी।”
कई बार जेल गए। जेल में भी आंदोलनकारियों को एकजुट करते। साथी कैदियों को पढ़ाते, प्रेरित करते और कहते —
“जेल की ये दीवारें हमारी आत्मा को कैद नहीं कर सकतीं।”

???? अध्याय 4: किसान नेता और समाज सुधारक
आज़ादी की लड़ाई के साथ-साथ उन्होंने किसानों की लड़ाई भी लड़ी।
जमींदारी प्रथा, ऊँच-नीच और शोषण के खिलाफ उन्होंने बिगुल बजाया।
???? वे कहते थे —
“असली भारत गाँव में बसता है। अगर किसान सुखी होगा तभी राष्ट्र समृद्ध होगा।”
उन्होंने सहजानंद सरस्वती के किसान आंदोलन से जुड़कर किसानों को एकजुट किया।
गरीबों के बीच शिक्षा का प्रसार, स्त्रियों की भागीदारी और समाज में समानता उनका मिशन था।
????️ अध्याय 5: स्वतंत्र भारत में राष्ट्र सृजन
1947 की आज़ादी के बाद कई सेनानी राजनीति में सत्ता के मोह में खो गए।
लेकिन बाबू रामविलास सिंह ने राजनीति को सत्ता नहीं, सेवा का माध्यम बनाया।
उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास पर काम किया।
स्कूल-कॉलेज की स्थापना कराई, सड़कें बनवाईं और किसानों के लिए सहकारी समितियाँ बनाई।
???? उनका सपना था —
“भारत एक आत्मनिर्भर राष्ट्र बने, जहाँ हर हाथ को काम और हर पेट को रोटी मिले।”
???? अध्याय 6: मानवीय व्यक्तित्व
रामविलास जी का व्यक्तित्व जितना दृढ़ था, उतना ही करुणामय भी।
वे हर गरीब किसान, हर विधवा, हर अनाथ के साथ खड़े हो जाते।
कहते थे —
“नेता वह नहीं जो मंच पर भाषण दे, नेता वह है जो संकट की घड़ी में आपके दरवाज़े पर सबसे पहले पहुँचे।”
उनकी सादगी अद्भुत थी। साधारण धोती-कुर्ता पहनते, जमीन पर बैठकर खाना खाते और गाँव-गाँव घूमकर लोगों की तकलीफ़ें सुनते।
????️ अध्याय 7: विरासत और स्मृति
2 अप्रैल 1978 को यह सृजन पुरुष इस दुनिया से विदा हो गए।
लेकिन उनकी स्मृति आज भी जहानाबाद की गलियों और खेतों में गूंजती है।
???? राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. प्रद्युम्न कुमार सिन्हा लिखते हैं:
“दादा श्री की विरासत केवल इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि हर किसान की मुस्कान और हर बच्चे की पढ़ाई में जीवित है।”
उनके नाम पर स्मारक, विद्यालय और संस्थाएँ बनीं।
लेकिन सबसे बड़ा स्मारक है — जनता का दिल।
???? निष्कर्ष
दादा श्री बाबू रामविलास सिंह केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे।
वे एक आंदोलन, एक विचारधारा और एक सदी का सृजन पुरुष थे।
???? उनकी जीवनगाथा हमें सिखाती है कि —
- संघर्ष बिना आज़ादी अधूरी है।
- सेवा बिना राजनीति खोखली है।
- और संस्कार बिना समाज अधूरा है।
✒️ Khabari News की कलम से
आज जब हम आधुनिक भारत की चुनौतियों की ओर देखते हैं, तो दादा श्री की याद हमें दिशा देती है।
एडिटर-इन-चीफ़ K.C. Shrivastava का अंतिम संदेश:
“आइए, हम सब मिलकर दादा श्री की उस विरासत को आगे बढ़ाएँ, जिसमें हर भारतीय सशक्त, आत्मनिर्भर और राष्ट्रप्रेमी बने।”




